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Showing posts from September, 2011

समझो गर तुम

शिकायत नहीं है वफ़ा से तुम्हारी  फिर भी तन्हाइयों के पास हूँ |
उलझी हूँ अपनी ही कुछ बातों से  फिर भी तो जिन्दगी की मैं आस हूँ |
क्यूँ ढूंढते हो मुझमें वो खुशियाँ  मैं तो अपने जीवन से निराश हूँ |
कोई अनजाना डर तो है दिल में वजह से उसकी ही मैं उदास  हूँ |
ज़िन्दगी जो अनजान है मुझसे  रंजों से ज़िन्दगी की मैं हताश हूँ | - दीप्ति शर्मा

अस्तित्व की तलास

दुनिया में रह मुझे उन तमाम  हस्तियों को पहचानना ही पड़ा | हर नए सफ़र की मुश्किलों को उन उलझनों को अपना समझ  दिल से उन्हें मानना ही पड़ा | जहाँ में खोये हुए अपने वजूद को इत्मिनान से तलाशना ही पड़ा | अपने कुछ उसूलों की खातिर  उस अस्तित्व को खोजते हुए मुझे अपने आप को जानना ही पड़ा | - दीप्ति शर्मा